बचपन










वो बच्चपन के भी क्या आलहम थे


शैतानी, मासूमियत, नादानी सब रंग थे


खुद की मर्ज़ी से जीने वाले, तब हम हम थे


मौसम, दोस्त, अपने सपने सब संग थे






हवा सा मन आज़ाद था


हर पल की कश्ती मे नया स्वाद था


ना कोई चिनता, ना कोई फसाद था


कुछ न जानकर भी, हमे सब याद था






ख्वाबो की सियाई से, 


शीशे की कलम भरके,


पत्थर से सूरज उगाते थे


नज़ाने क्या क्या तस्वीरें बनाते थे 






बड़े हुए तो सब तस्वीरें बदल गयी


हक़ीक़त के पानी से सपनो की परछाइयाँ गल गईं






जो कोरा कागज, बारिश की कश्ती बन्ने का मोहताज था,


कभी पंखा , कभी खबर की आवाज था


बड़े हुए तो जाना, की वो जानलेवा साज है


उसे रंग दिअ ह कुछ ऐसे, की अब वो सरताज है






हर पल आपस मे लडकर भी, दिल का पैमाना मीठा था


आज रोज़ गले मिलते है, फिर भी मन मे जहरीले जाम है






आज़ादी का तब कुछ ऐसा मुकाम था


जाती गाड़ियाँ गिनते थे


फूलों की पंखुड़ियां चुनते थे


और आज ना सुभा का पता है, और ना कोई शाम है






काश कि बचपन मे जाने की कोई सुरंग हो


जहाँ ख्वाबों का आशियाना सत रंग हो


ख्याल जैसे उड़ती पतंग हो


हर पल मे उमंग- तरंग हो


काश हमारा बचपन फिर हमारे संग हो


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